मोरबी की सेरामिक टाइल इंडस्ट्री संकट में है, जहां मिडिल ईस्ट युद्ध के कारण प्रोपेन और नेचुरल गैस की आपूर्ति ठप हो गई है। 600 से अधिक यूनिट्स और 4 लाख से ज्यादा मजदूरों की नौकरियां खतरे में हैं। इंडस्ट्री लीडर्स का कहना है कि गैस स्टॉक सिर्फ 3 दिनों का बचा है, जिससे उत्पादन रुक सकता है और हजारों करोड़ का नुकसान हो सकता है।
गुजरात के मोरबी में स्थित सेरामिक टाइल इंडस्ट्री दुनिया के सबसे बड़े क्लस्टर में से एक है, जो भारत की 80-90% सेरामिक प्रोडक्शन का केंद्र है। इस इंडस्ट्री पर अमेरिका-इजराइल और ईरान के बीच चल रहे युद्ध का सीधा असर पड़ रहा है। युद्ध के कारण गल्फ रीजन से प्रोपेन गैस और नेचुरल गैस की सप्लाई पूरी तरह प्रभावित हो गई है, क्योंकि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर जहाजों की आवाजाही रुक गई है और कई गल्फ पोर्ट्स में डिलीवरी ठप है।
मोरबी सेरामिक मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष मनोज अरवाड़िया ने चेतावनी दी है कि अगर गैस सप्लाई जल्द बहाल नहीं हुई तो पूरी इंडस्ट्री को बंद करना पड़ सकता है। इंडस्ट्री रोजाना करीब 25 लाख क्यूबिक मीटर नेचुरल गैस और 55 लाख क्यूबिक मीटर प्रोपेन का इस्तेमाल करती है, जो किल्न्स को हाई टेम्परेचर पर चलाने के लिए जरूरी है। एक बार किल्न बंद होने पर उपकरण खराब हो सकते हैं और प्रोडक्ट क्वालिटी प्रभावित होती है।
वर्तमान में प्रोपेन का स्टॉक सिर्फ 3 दिनों का बचा है। कई सप्लायर्स ने बताया कि बुधवार रात या गुरुवार से ही 300 से ज्यादा प्रोपेन आधारित यूनिट्स बंद होना शुरू हो सकती हैं। अगर स्थिति नहीं सुधरी तो अगले 7-10 दिनों में 600 से अधिक यूनिट्स पर ताला लग सकता है।
इंडस्ट्री पर आर्थिक प्रभाव
मोरबी क्लस्टर का सालाना टर्नओवर करीब 60,000 करोड़ रुपये है।
एक्सपोर्ट टर्नओवर 16,000-18,000 करोड़ रुपये, जिसमें से 20-25% गल्फ देशों को जाता है।
युद्ध के कारण एक्सपोर्ट में 400-500 करोड़ रुपये का सीधा नुकसान पहले ही हो चुका है।
फ्रेट रेट्स में भारी उछाल और इंश्योरेंस कॉस्ट बढ़ने से शिपमेंट्स प्रभावित।
नौकरियों पर खतरा इस क्लस्टर में 600 से ज्यादा यूनिट्स सीधे और अप्रत्यक्ष रूप से 4 लाख से अधिक लोगों को रोजगार देती हैं। इनमें मजदूर, ट्रांसपोर्टर, ट्रेडर्स, पैकेजिंग यूनिट्स और अन्य सहायक व्यवसाय शामिल हैं। उत्पादन रुकने से लाखों परिवारों की आजीविका पर संकट मंडरा रहा है।
सरकार और इंडस्ट्री की मांगें इंडस्ट्री लीडर्स केंद्र और राज्य सरकार से तत्काल हस्तक्षेप की मांग कर रहे हैं। वैकल्पिक सोर्स से गैस इंपोर्ट, स्पॉट टेंडर्स और डोमेस्टिक सप्लाई बढ़ाने की जरूरत है। हालांकि, ग्लोबल गैस प्राइसेज में 30% से ज्यादा उछाल और शिपिंग रिस्क के कारण वैकल्पिक रास्ते महंगे साबित हो रहे हैं।
संभावित परिणाम अगर संकट लंबा चला
निर्माण सेक्टर में टाइल्स की कमी से प्रोजेक्ट्स डिले।
एक्सपोर्ट मार्केट में चीन और अन्य देशों को फायदा।
लोकल इकोनॉमी पर भारी असर, खासकर गुजरात में।
रेमिटेंस और अन्य सेक्टरों पर अप्रत्यक्ष प्रभाव।
यह संकट भारत की एनर्जी डिपेंडेंसी और ग्लोबल सप्लाई चेन की कमजोरी को उजागर कर रहा है। डिप्लोमेसी से जल्द स्थिरता लौटना इंडस्ट्री के लिए जरूरी है।
Disclaimer: यह खबर उपलब्ध जानकारी और इंडस्ट्री सोर्सेज पर आधारित है। स्थिति तेजी से बदल सकती है।






