**” अमेरिका-भारत ट्रेड डील और वैश्विक मैक्रो चिंताओं में कमी के बीच विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) ने फरवरी के पहले पखवाड़े में भारतीय इक्विटी में ₹19,675 करोड़ का शुद्ध निवेश किया है। पिछले तीन महीनों की भारी बिकवाली के बाद यह तेज यू-टर्न आया है, जबकि 2025 में कुल ₹1.66 लाख करोड़ (लगभग 19 अरब डॉलर) की निकासी हुई थी। “**
भारत और अमेरिका के बीच हुए ट्रेड समझौते ने विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) के मूड में बड़ा बदलाव लाया है। फरवरी महीने के पहले 15 दिनों (13 फरवरी तक) में FPIs ने भारतीय इक्विटी बाजार में कुल ₹19,675 करोड़ का शुद्ध निवेश किया है। यह आंकड़ा डिपॉजिटरी डेटा से सामने आया है और तीन लगातार महीनों की भारी बिकवाली के बाद निवेशकों की मजबूत वापसी दर्शाता है।
पिछले साल 2025 में FPIs ने भारतीय शेयरों से कुल ₹1.66 लाख करोड़ (करीब 18.9 से 19 अरब डॉलर) की निकासी की थी, जो कई सालों में सबसे ज्यादा बिकवाली का दौर था। इस निकासी की वजह वैश्विक व्यापार तनाव, अमेरिकी टैरिफ की आशंका, रुपये की अस्थिरता और भारतीय इक्विटी की स्ट्रेच्ड वैल्यूएशन बताई जाती है। नवंबर 2025 में ₹3,765 करोड़, दिसंबर में ₹22,611 करोड़ और जनवरी 2026 में ₹35,962 करोड़ की बिकवाली हुई थी।
फरवरी में स्थिति पूरी तरह पलट गई। ट्रेड डील से टैरिफ में कमी (कुछ सेक्टरों में 50% से घटाकर 18% तक) और भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं में कमी ने FPIs को आकर्षित किया। रुपये में भी सुधार देखा गया, जो 90.30 के स्तर से 90.50 के आसपास स्थिर हुआ, जिससे फॉरेक्स रिस्क कम हुआ। साथ ही, अमेरिकी इन्फ्लेशन डेटा में नरमी से फेडरल रिजर्व की ब्याज दर चक्र पर सकारात्मक संकेत मिले, जिसने बॉन्ड यील्ड और डॉलर को स्थिर किया।
डेटा से पता चलता है कि फरवरी के पहले पखवाड़े में कुल 11 ट्रेडिंग सेशंस में से FPIs 7 सेशंस में नेट बायर रहे और केवल 4 में सेलर। यह खरीदारी मुख्य रूप से इक्विटी सेगमेंट में केंद्रित रही, जहां स्टॉक एक्सचेंज रूट से ₹19,040 करोड़ से ज्यादा का निवेश हुआ। कुछ हिस्सा डेट और हाइब्रिड कैटेगरी में भी गया, लेकिन इक्विटी में सबसे ज्यादा जोर रहा।
ट्रेड डील के प्रमुख लाभ वाले सेक्टरों में निर्यात-उन्मुख कंपनियां शामिल हैं, जैसे ऑटो, फार्मा, टेक्सटाइल और केमिकल्स, जहां टैरिफ राहत से मार्जिन सुधार की उम्मीद है। हालांकि, IT सेक्टर में AI से जुड़ी चुनौतियों के कारण कुछ कमजोरी बनी हुई है। यूनियन बजट 2026 में फिस्कल प्रूडेंस और ग्रोथ-ओरिएंटेड फैसलों ने भी घरेलू सेंटिमेंट को मजबूत किया, जिससे FPIs को अतिरिक्त कॉन्फिडेंस मिला।
विश्लेषकों का मानना है कि यह रिवर्सल अभी शुरुआती दौर में है। वैश्विक मैक्रो में सुधार और ट्रेड डील की फुल इम्प्लीमेंटेशन से आगे और निवेश आ सकता है। हालांकि, कुछ दिनों में देखी गई सेलिंग (जैसे 13 फरवरी को ₹7,395 करोड़ की बिकवाली) से पता चलता है कि बाजार में उतार-चढ़ाव बना रह सकता है।
यह बदलाव भारतीय बाजार के लिए सकारात्मक संकेत है, क्योंकि FPIs की वापसी से लिक्विडिटी बढ़ती है और इंडेक्स में स्थिरता आती है। घरेलू निवेशक (DIIs) पहले से ही मजबूत सपोर्ट दे रहे हैं, लेकिन FPIs की भागीदारी से मार्केट में नई रफ्तार आ सकती है।
Disclaimer: यह खबर उपलब्ध डेटा और बाजार रुझानों पर आधारित है। निवेश से पहले अपने सलाहकार से परामर्श लें।






